Friday, August 29, 2025

“आपकी पुस्तक, आपका कॉपीराइट, आपकी रॉयल्टी” - मुहिम

“आपकी पुस्तक, आपका कॉपीराइट, आपकी रॉयल्टी” - अविकावनी प्रकाशन की मुहिम

📝 रचना शीर्षक: “आपकी पुस्तक, आपका कॉपीराइट, आपकी रॉयल्टी” - अविकावनी प्रकाशन की मुहिम

👤 कवि का नाम: Anand Kumar Ashodhiya

🎶 किस्सा / शैली: प्रकाशन सूचना 

🔖 Labels: Anand Kumar Ashodhiya, Avikavani Publishers, अविकावनी प्रकाशन   



यह संदेश नवोदित लेखकों को स्वतंत्र प्रकाशन, कॉपीराइट अधिकार, और रॉयल्टी संरचना के प्रति जागरूक करता है, साथ ही उन्हें ISBN-संलग्न प्रकाशन का सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

📘 Avikavani Publishers अविकावनी प्रकाशन मार्गदर्शी योजना

आपकी पुस्तक, आपका कॉपीराइट, आपकी रॉयल्टी” मुहिम के तहत

प्रिय नवोदित लेखकगण,

यदि आपके पास विचार हैं, भाव हैं, अनुभव हैं — और उन्हें शब्दों में ढालने का साहस है — तो AAvikavani Publishers अविकावनी प्रकाशन आपके लिए एक मंच नहीं, एक संकल्प है।

हम मानते हैं कि हर लेखक को अपनी रचना पर पूर्ण अधिकार, सांस्कृतिक सम्मान, और आर्थिक पारदर्शिता मिलनी चाहिए। इसी उद्देश्य से हमने शुरू की है:
✍️ “आपकी पुस्तक, आपका कॉपीराइट, आपकी रॉयल्टी” मुहिम

इस योजना के अंतर्गत:

📚 आपकी पुस्तक को मिलेगा आधिकारिक ISBN नंबर
जिससे आपकी रचना को वैश्विक पहचान और पुस्तकालयीय मान्यता प्राप्त होगी।

🛡️ कॉपीराइट रहेगा लेखक के नाम पर सुरक्षित
ताकि आपकी रचना का नैतिक और कानूनी स्वामित्व केवल आपके पास रहे।

💰 रॉयल्टी संरचना रहेगी पारदर्शी और लेखक-केंद्रित
जिससे हर बिक्री पर आपको उचित आर्थिक लाभ प्राप्त हो।

📖 प्रकाशन प्रक्रिया में मिलेगा मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग
चाहे वह पांडुलिपि तैयार करना हो, डिज़ाइन करना हो, या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित करना।

🤝 लेखक को मिलेगा सम्मान, मंच और समुदाय
ताकि आप अकेले नहीं, बल्कि एक साहित्यिक परिवार का हिस्सा बनें।

यदि आप अपनी पुस्तक या रचनाओं को प्रकाशित करवाना चाहते हैं — कविता, कहानी, रागणी, भजन, संस्मरण या शोध — तो Avikavani Publishers अविकावनी प्रकाशन आपके साथ है।

📩 संपर्क करें: Anand Kumar Ashodhiya
✉️ ashodhiya68@gmail.com
📍 शाहपुर तुर्क, सोनीपत, हरियाणा

Avikavani Publishers अविकावनी प्रकाशन
लोक साहित्य की सेवा में समर्पित

📜 कवि परिचय: “आपकी पुस्तक, आपका कॉपीराइट, आपकी रॉयल्टी” - Avikavani Publishers अविकावनी प्रकाशन की मुहिम — "हरियाणवी रागणी के क्षेत्र में सक्रिय, मंचीय कवि, लोक-संस्कृति के संवाहक"

© Anand Kumar Ashodhiya, सभी अधिकार सुरक्षित।

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Sunday, August 10, 2025

चुनावी रागणी - शतुरमुर्ग

📝 रचना शीर्षक: चुनावी रागणी - शतुरमुर्ग   


👤 कवि का नाम: Anand Kumar Ashodhiya   

 

🎶 किस्सा / शैली: फुटकड़ रागणी  


🔖 Labels: Anand Kumar Ashodhiya, फुटकड़ रागणी, रागणी 


विकास का मुद्दा ठावण आळी, वा पार्टी पड़कै सो ली 

जो सरकार बणाई थी वा, मनै पाँच बरस तक रो ली 


शाल दुशाले काम्बळ काळे, मनै धर लिए तह लगाकै

देशी इंग्लिश की पेटी भी, मनै धर ली गिणा गिणाकै

अरै वोट कितै और चोट कितै, मैं आग्या बटण दबाकै

नाच नाच कै ढोल बजाया, मनै पंगु सरकार बणाकै

इब शतुरमुर्ग की तरिया मनै, रेत में नाड़ गडो ली

जो सरकार बणाई थी वा, मनै पाँच बरस तक रो ली 


देख देख कै नोटां की तह, मनै मन की लौ बुझा दी 

अरै बेगैरत की ढाळ आत्मा, देकै लोभ सुवा दी 

ले ले कै नै नोट करारे, मनै बोगस वोट घला दी 

ज़मीर बेचकै सोदा पाड़या, बोटां की झड़ी लगा दी 

इब पछता कै के फायदा जब, पाप में टाँग डबो ली 

जो सरकार बणाई थी वा, मनै पाँच बरस तक रो ली 


कदे धर्म पै कदे जात पै, कदे माणस ऊपर हार गया 

कदे नामा कदे जड़ का सामा, वोट के ऊपर वार गया 

कदे इंग्लिश कदे घर की काढी, गळ के नीचै तार गया 

झूठ कपट बेईमानी का नश्तर, सबके भीतर पार गया 

सच की घीटी पै पांह धरकै, मनै पाप की गठड़ी ढो ली 

जो सरकार बणाई थी वा, मनै पाँच बरस तक रो ली 


सही समय पै सही माणस नै, चुणने में हम फेल रहे 

गुरु पालेराम की बोट की खातिर, बड़े बड़े पापड़ बेल रहे 

अपणी बात बणावण खातिर, झूठ बवण्डर पेल रहे 

पाप की लकड़ी, सच की गिंडु, टोरम टोरा खेल रहे 

"आनन्द शाहपुर" चेत खड़या हो, क्यूँ नाश की राही टोह ली 

जो सरकार बणाई थी वा, मनै पाँच बरस तक रो ली 


कॉपीराइट©आनन्द कुमार आशोधिया 2024-25

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बुढ़ापा - नई हरयाणवी रागणी



📝 रचना शीर्षक: [बुढ़ापा - नई हरयाणवी रागणी ]

👤 कवि का नाम: [Anand Kumar Ashodhiya]

🎶 किस्सा / शैली: [फुटकड़ रागणी]

🔖 Labels: [Anand Kumar Ashodhiya, फुटकड़ रागणी]


✍️ रचना:

बुढ़ापा - नई हरयाणवी रागणी 


बचपन बीत्या, गई जवानी, फेर बैरी बुढ़ापा आवै सै 

घर कुणबा भरपूर बुढ़ापा, एकला ए खड़या लखावै सै 


मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा, हर दर पै शीश झुकाया था 

थान अर खेड़ा दादा पित्तर, मना कै जल चढ़ाया था

मांग मांग कै हर दर पै मन्नत, बेटे का सुख पाया था 

तेरी खुशी तै बढ़कै बेटा, ना दुनिया में सुख चाहया था 

पुत्र पा कै मात पिता भाई, मन ही मन हर्षावै सै 


पेट काट कै पढ़ा दिया, तूं सरकारी अफसर बणग्या

देख देख कै तेरी तरक्की, म्हारा सिर भी न्यू तणग्या

फेर ऐसा पल्टा लिया काळ नै तूं लव मैरिज पै ठणग्या 

मार कै ठोकर सब क्याहे कै बदनामी नै सिर खिणग्या

इब पोता पोती नै आगै करकै, क्यूं मोह का जाळ फलावै सै 


तेरी बहु के डर तै घर का, कुणा कूणा कांपै सै

इसी मास्टरणी लाग रही, म्हारा खाणा तक भी नापै सै 

सास ससुर नै लगा काम पै, नौकर की ज्यूं राखै सै 

पशुआं तै भी बदतर ज़िंदगी, मार कामड़े हांकै सै 

म्हारी आत्मा घायल करकै क्यूं अपणा भाग रूसावै सै


धूरत लोभी लंपट कपटी, यो बेटा नहीं हवाला सै 

अपना ए सिक्का जर हो तै फेर उसका राम रुखाला सै 

वृद्ध आश्रम की त्यारी करली, म्हारी ज्यान का गाला सै 

गुरू पालेराम भी जांच परखग्या, यो आनन्द शाहपुर आला सै 

जिस आंगण में जन्म लिया क्यूं उसतै दूर भगावै सै

कॉपीराइट©आनन्द कुमार आशोधिया 2024-25 


📜 कवि परिचय:

[Anand Kumar Ashodhiya — "हरियाणवी रागणी कवि]


© [Anand Kumar Ashodhiya], सभी अधिकार सुरक्षित।

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आज्या राखी बंधा ज्या भाई

आज्या राखी बंधा ज्या भाई


👤 कवि का नाम: [आनन्द कुमार आशोधिया]

🎶 किस्सा / शैली: [फुटकड़ रागणी]

🔖 Labels: [आनन्द कुमार आशोधिया, फुटकड़, करुण]


✍️ रचना:

आज्या राखी बंधा ज्या भाई


आज्या राखी बंधा ज्या भाई, बाहण पुकारे तेरी याद में।

सुन्नी तेरी कलाई भाई, जाइए तूँ बॉर्डर ऊपर बाद में।।


तूँ आया जब खुशी खुशी में, घर घर बंटी मिठाई।

बाळक सी थी फिरूँ नाचती, फूली नही समाई।।

भाई आग्या घर म्हारै, सारै गाती फिरूँ थी दिन और रात में।।


दसमी कर के कॉलेज पढ़ग्या, भर्ती हुया फौज में।

भारत माँ की करे नौकरी, कुनबा हुया मौज में ।।

रोज मैं याद करूँ मेरे बीरा, आणा था इबकै तन्ने साढ़ में।।


सामण आग्या, झूले पड़गे, मन में खुशी समाई।

सारे गाम में रुक्का पड़ग्या, छूटी आग्या भाई।।

ल्याई प्रेम की राखी रे बुणके, प्यारे से भाई के लाड में।।


कोए बहाना इब ना चाले, नेग लेऊँगी डटके।

हाथ बढ़ा ल्या राखी बाँधू, वारी जाऊं सदके।।

जबते आनन्द भाई ते फेटी, मानूँ सूँ घणी ए उसकी ठाढ़ मैं।।


📜 कवि परिचय:

[आनन्द कुमार आशोधिया — : "हरियाणवी रागणी के क्षेत्र में सक्रिय, मंचीय कवि, लोक-संस्कृति के संवाहक"]


© [आनन्द कुमार आशोधिया], सभी अधिकार सुरक्षित।

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Saturday, August 9, 2025

हीर राँझा - कैदों द्वारा हीर को ज़हर देकर मरवाना

📝 रचना शीर्षक: [हीर राँझा - कैदों द्वारा हीर को ज़हर देकर मरवाना]

👤 कवि का नाम: [Anand Kumar Ashodhiya]

🎶 किस्सा / शैली: [Heer Ranjha]

🔖 Labels: [Anand Kumar Ashodhiya, Heer Ranjha, Virah Ras]


✍️ रचना:

[यहाँ अपनी रचना लिखें — हर पंक्ति अलग रखें, जैसे:]

हीर राँझा - कैदों द्वारा हीर को ज़हर देकर मरवाना


हीर राँझा - कैदों द्वारा हीर को ज़हर देकर मरवाना
वृतांत : हीर रांझे के विवाह में हीर की मौत पर रांझे का विलाप
तर्ज: नगरी नगरी द्वारे द्वारे ढूंढू रे सांवरिया

मेरी हीर मार कै गेर देई, तम्ह मन्नै भी मरवाइयो रै
जो भी जहर दिया हीरे तै, वो मन्नै भी चटवाइयो रै

आदिल शाह राजा के हुक्म तै, हीरे नै ब्याहवण आया था
हीरे नै ब्याहवण आया था
बिछड़े यार फेर मिलैंगे, चढ़या मन में घणा उम्हाया था
चढ़या मन में घणा उम्हाया था
मैं तै मोड़ बाँध कै आया था, इस मोड़ नै परै बगाइयो रै

सारे बदन में ज़हर फ़ैलग्या, मेरी हीरे लीली पड़गी रै
मेरी हीरे लीली पड़गी रै
होंठ काळमा आँख मूँद रही, चेहरे की लाली झड़गी रै
चेहरे की लाली झड़गी रै
इकै कुणसी नागिण लड़गी रै, उतै मनै भी डसवाईयो रै

हीरे तड़फ तड़फ कै मरगी, मैं तै खड़या देखता रहग्या
मैं तै खड़या देखता रहग्या
मेरे प्यार के मन मन्दिर का, यो बुर्ज किला सा ढहग्या
यो बुर्ज किला सा ढहग्या
मेरी आँख्यां में तै दरिया बहग्या, आँख्या की गर्द हटाइयो रै

वो लाड्डू दियो मन्नै खुवा तुम्ह, जिसमें ज़हर मिलाया
जिसमें ज़हर मिलाया
चाचा हो कै डूब मरै नै, खुद बेटी तै ज़हर खिलाया
खुद बेटी तै ज़हर खिलाया
खुद आनन्द शाहपुर देखकै आया, उसनै याहड़ै बुलाइयो रै 🙂
कॉपीराइट©️आनन्द कुमार आशोधिया©2025
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📜 कवि परिचय:

[Anand Kumar Ashodhiya — : "हरियाणवी रागणी के क्षेत्र में सक्रिय, मंचीय कवि, लोक-संस्कृति के संवाहक"]


© [Anand Kumar Ashodhiya], सभी अधिकार सुरक्षित।

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हीर राँझा - नई हरयाणवी रागणी

 

हीर राँझा - नई हरयाणवी रागणी

हीर राँझा - नई हरयाणवी रागणी
वृतांत: हीर की नणंद “सहती” बाबा रूपी राँझे से
तर्ज: कुएं पै लुगाइयां धौरे

हो उतरता ना ताप बाबा, झोड़ा होया शरीर का
तावळा सा चाल बाबा, झाड़ा लादे पीर का

जिस दिन तै वा ब्याहली आई, खाट के म्ह पड़ी रहै
खाया पिया लागै कोन्या, मुंह की लाली झड़ी रहै
एकटक देखे जा सै, कोळै लागी खड़ी रहै
बेरा ना के सोचे जा सै, चिन्ता के म्ह बड़ी रहै
हो ढळी रहै काया दुख में, रोळा सै तकदीर का

चौबीस घंटे रोए जा सै, म्हारी ज्यान नै खाड़ा होग्या
बुझे तै भी बोलै कोन्या, इसा ज्यान का राड़ा होग्या
रूप हुस्न की अंगारी पै, मेरा भाई लाड़ा होग्या
ना खाए ना उगले बणता, किसा गजब पुवाड़ा होग्या
हो गात सूख कै माड़ा होग्या, उस नई नवेली हीर का

ऊपर तळै साँस होज्या, बेदम हो कै उखड़ज्या
पेट के म्ह गोडे दे ले, सारी काया सुकड़ज्या
माथे के म्ह त्यौड़ी पड़ज्या, सारा गात अकड़ज्या
हाथ पाँव ढीले पड़ज्या, जाड़ी मुट्ठी जकड़ज्या
सांप लिकड़ज्या पीटे का के, फायदा फेर लकीर का

लोचे जा शरीर उसका, नागिण की ज्यूँ तणग्या
राँझा राँझा रटे जा सै, यो के रोळा ठणग्या
म्हारी गाळ में भाईरोया, बदनामी सिर खिणग्या
सोच समझकै छंद धरकै, वो रागणियां नै चिणग्या
आनन्द शाहपुर सेवक बणग्या, उस पालेराम वजीर का 🙂
कॉपीराइट©️आनन्द कुमार आशोधिया©2025

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