Friday, October 23, 2026

रागणी 19 - हरियाणे की सभ्यता और संस्कृति - नई हरयाणवी रागणी : लेखक आनन्द कुमार आशोधिया (कवि आनन्द शाहपुर)

रागणी 19 - हरियाणे की सभ्यता और संस्कृति - नई हरयाणवी रागणी : लेखक आनन्द कुमार आशोधिया (कवि आनन्द शाहपुर)

रागणी 19 - हरियाणे की सभ्यता और संस्कृति - नई हरयाणवी रागणी

हरियाणे की सभ्यता और, संस्कृति कै बट्टा लाओ ना
लिहाज़ शर्म कुछ बाकि हो तै, गन्दा गाणा गाओ ना

नाचण में कोई दोष नहीं, या दुनिया रँग बिरँगी है
नाचो गाओ ख़ुशी मनाओ, कौण कहै बेढ़ंगी है
अर्धनगन क्यूँ हो कै नाचो, के वस्त्र की तंगी है
सारी दुनिया तानें मारै, या असंस्कारी नंगी है
ओछे कपड़े, गन्दा गाणा, यो नँगा नाच नचाओ ना

बन्द कमरे में लाइव पै करै, के घरक्या आगै कर लेगी
जब स्याणे हो तेरे बालक देखैं, तूँ आप शर्म तै मर लेगी
बदन दिखाकै करै कमाई, के पाप खढ़े नै भर लेगी
रकम आवणी जाणी सै, के छाती ऊपर धर लेगी
दस नौहां तै करो कमाई, पाप कर्म का खाओ ना

जीजा साली, देवर भाभी, रिश्ते कद्र करण के हों
दोस्त दोस्ती, मित्र प्यारे, जग में प्यार परण के हों
जात पात और ताकत पैसा, अहँकार धरण के हों
दया भाव और शील सुभा, ये खेवा पार तिरण के हों
धर्म छोड़ के अधर्म करते, कुल कै स्याही लाओ ना

तेरे हाथ में थमी लेखनी या विषधर के समान हो सै
दोमुँही निभ फटी बीच तै, इकी दोधारी ज़ुबान हो सै
काळी जीभ, द्विअर्थी मायने, कवियां की दूकान हो सै
सच की ईंट, धर्म के रोड़े, कविताई की ज्यान हो सै
आनन्द शाहपुर कविताई में, गन्दी कार कमाओ ना

कॉपीराइटआनन्द कुमार आशोधिया©2026
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लेखक आनन्द कुमार आशोधिया (कवि आनन्द शाहपुर)

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